Wednesday, 27 January 2010
स्वस्थ गणतन्त्र की चुनौतियों से निपटना अभी बाकी है
26 जनवरी 1950 सेशूरू हुआ गणतान्त्रिक सफर भारत ने सफलतापूर्वक जारी रखा है। इसलोकतान्त्रिक सफर में प्रत्येक भारतवासी का प्रेम व स्नेह प्राप्त हुआहै। शुरूआत में कुछ परेशानियाँ जरूर हुई इसके बावजूद आज भारत सफलता कीराह पर बढ़ चुका है।आज भारत की अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर धाक है। संचार और सेवा जैसेक्षेत्रों में भारत के नाम का डंका बज रहा है। विज्ञान, अन्तरिक्ष पर्यटनजैसे क्षेत्र भी इस सफलता से अछूते नहीं रहे। भीषण मन्दी से कराहतीदुनिया के बीच भारत की 7.9 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि दर उत्साह जगाती है।नवधनाढ्यों का उदय, आम भारतीयों की जीवन दशा में सुधार, प्रतिव्यक्ति आयमें वृद्धि रोजगार के अवसरों में वृद्धि सशक्त होती भारतीय अर्थव्यवस्थाका सबूत है।देश की आबादी 1.20 अरब है। देश में मोबाइल धारकों की संख्या 40.31 करोड़पहुँच गयी है। भारत दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ता मोबाइल बाजार है।शिक्षा के क्षेत्र में भी भारत सरकार कितनी गम्भीर है इसका अन्दाजा इसबात से लगाया जा सकता है कि शिक्षा के मद में किया जाने वाला खर्च कुलजी.डी.पी. का छह फीसदी कर दिया गया है।आज भारत में 400 से ज्यादा सरकारी विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा उपलब्ध करारहे हैं। इनमें 16 केन्द्रीय विश्वविद्यालय हैं। इसी तरह 128 डीम्डविश्वविद्यालयों के साथ ही छह आई.आई.टी.और सात के लगभग आईआईयम जैसेविश्वप्रतिष्ठत संस्थान भी शामिल हैं।इसी तरह की तस्वीर कृषि परिवहन स्वास्थय जैसे क्षेत्रों का भी है।लेकिन गणतन्त्र भारत की सफलता की तस्वीर का क्या यही एक ही पहलू है।थोड़ा ठहर कर सोचें। इस सामान्य सी दिखने वाले सच्चाई के इतर दूसरा स्याहपहलू भी है। भारत के समक्ष चुनौतियां भी कम नहीं हैं। जो भारतीय गणतन्त्रकी सफलता को संदिग्ध बनाती है।सच यही है कि भारत आज भी तमाम तरह की आन्तरिक और वाह्य चुनौतियों से जूझरहा है। वाह्य मोर्चे पर सीमाओं की सुरक्षा पर आज भी प्रश्नचिह्न लगा हुआहै। पाकिस्तान और चीन जैसे विरोधी देशों से एक साथ मुकाबिल होना पड़ रहाहै। जिनसे हमारी सीमाओं का विवाद आज भी नहीं सुलझ पाया है। आये दिन हमेंचीन की एक से बढ़कर एक दुस्साहसों का सामना करना पड़ रहा है। पाकिस्तानभी इस मामले में पीछे नहीं है। पाकिस्तान से अब तक तीन लड़ाईयाँ लड़ी जाचुकी हैं। हर बार हार के बाद पाकिस्तान अब छद्म युद्ध .आतंकवाद. के सहारेमुसीबतों का संजाल बिछाये हुये है। अब हमे एक तरह के अघोषित युद्ध काजिसका कि अन्त नहीं होता दिखता आये दिन सामना करना पड़ता हैं। लेकिनपड़ोसी के साथ शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व की भावना से ही अक्षरधाम-मन्दिरहमला हो या संसद पर हमला यहाँ तक कि 2611 की आतंक की चरम विभीषिका झेललेने के बावजूद एकतरफा शान्ति की कोशिश जारी है। लेकिन सवाल अभी भी बनाहूआ है कि आखिर कब तक।बाहरी मोर्चे की चिन्ता यहीं खत्म नहीं होती है। भारता हमेशा सेपड़ोसियों से मधुर सम्बन्धों का हिमायती रहा है। हमारे वैदेशिक वकूटनीतिक सम्बन्ध सदैव अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों की गरिमा के अनुकूल रहेहैं। इसके बावजूद नेपाल श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों से सम्बन्धों के स्तरमें ह्रास की स्थति एक शोचनीय पहलू है।भारत के आन्तरिक मोर्चे पर भी चुनौतियां कम चिन्ताजनक नहीं है। गरीबी वशोंषण जैसी स्थिति में आम नागरिकों की उपेक्षाओं से नक्सलवाद अलगाववादजैसी नासूर सरीखी समस्यायें उभरी हैं। आज देश के लगभग 22 राज्य नक्सलवादसे पीड़ित हैं। भारत को अपने ही नागरिकों के असन्तोष और आक्रोश का सामनाकरना पड़ रहा है। यह एक गणतन्त्रीय राष्ट्र की बदनसीबी है की उसे अपने हीनागरिकों के विरुद्ध हथियार उठाना पड़ रहा है। आज देश के अधिकाँश हिस्सोंमें अलगाववाद की बू आ रही है। पंजाब हरियाणा हिमांचल जैसे कुछेक राज्योंको अगर छोड़ दिया जाय तो अधिकाँश राज्य असन्तोष की आग में विभाजन की कगारपऱ खड़े हैं।.यह एक विडंबना है कि आर्थिक उदारीकरण के पश्चात भारत में आयी समृद्धिसमाज के कुछ वर्गों तक सिमट कर रह गयी है। एक आँकड़े के मुताबिक देश की20प्रतिशत जनसंख्या 80 प्रतिशत संसाधनों पर कब्जा जमाये बैठा है तो80प्रतिशत जनसंख्या 20 प्रतिशत संसाधनों पर जीने को मजबूर है। देश मेंचारों तरफ घोर आर्थिक असमानता दिखायी पड़ती है। भारत में ही आर्थिकअसमानता के आधार पर दो भाग बन चुके हैं।एक तरफ इन्डिया जहाँ आर्थिक समृद्धि का सजीला टापू नजर आता है। तो दूसरीतरफ हिन्दुस्तान जिसे दो जून की रोटी मुश्किल से ही नसीब हो रही है।य़ोजना आयोग द्वारा गठित तेन्दुलकर समिति की रिपोर्ट में कहा गया है किभारत में 42.50 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन को मजबूरहै। अगर 2007 में जारी अर्जुन सेन गुप्ता को सच मान लिया जाय तो यहआँकड़ा 77 प्रतिशत तक पहुँच जाता है। जिसका कि उपभोग-व्यय प्रतिदिन मात्र20 रुपये है। भारत दुनिया के उन शीर्ष देशों में भी शामिल है जहाँ सबसेज्यादा लगभग दो करोड़ कुपोषित बच्चे रहते हैं।यही नहीं महिला सशक्तिकरण का दावा हमार कितना खोखला है यह इसी से साबितहो जाता है कि अभी तक विधायिका में हम महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण तकनही दिलवा पाये हैं। संविधान में वर्णित न्याय व समता का लक्ष्य दलितोंशोषितों के लिये आज भी एक बड़ी चुनौती है। अभी छुआछूत भेदभाव की खबरेंआती रहती हैं। वर्ष 2007 में कंट्रोलर एंड आडिटर जनरल आफ इन्डिया कीरिपोर्ट में इस बात को विशेष रूप से उल्लिखित किया गया है। यथार्थ यही हैकि संविधान में वर्णित लक्ष्यों को हम अभी भी पूरा नहीं कर पायें हैं।असल चुनौतियाँ अभी भी बरकरार हैं। जब तक हम इन समस्याओं को हल नहीं करलेते हैं तब तक एक स्वस्थ गणतन्त्र का दावा करना बेमानी है।
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